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क्या कुरीतियों के कंधों पर खड़ा समाज कभी ‘सभ्य’ कहलाएगा !

क्या कुरीतियों के कंधों पर खड़ा समाज कभी ‘सभ्य’ कहलाएगा !

 

स्वतंत्र लेखक ✍️

मुंबई (इंद्र यादव) आज हम चांद पर पहुँच गए हैं, हाथ में स्मार्टफोन है और दुनिया मुट्ठी में है। लेकिन क्या सिर्फ मशीनों और तकनीक के आ जाने से हम ‘सभ्य’ हो गए हैं? असली सभ्यता ईंट-पत्थरों की इमारतों में नहीं, बल्कि इंसान के व्यवहार और उसकी सोच में बसती है।

जब हम उन लोगों की बात करते हैं जो कुरीतियों (गलत सामाजिक प्रथाओं) का समर्थन करते हैं, तो वे एक ऐसी दीवार खड़ी कर रहे होते हैं जिसके पीछे समाज का दम घुटता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह ‘सभ्य समाज’ की राह में कैसे सबसे बड़ा रोड़ा है।

 

परंपरा और कुरीति के बीच का महीन फर्क

 

अक्सर कुरीतियों के समर्थक एक तर्क देते हैं— “यह हमारी पुरानी परंपरा है, इसे कैसे छोड़ दें?” लेकिन समझने वाली बात यह है कि.

परंपरा वह है जो समाज को जोड़ती है, खुशियाँ बाँटती है और नैतिक मूल्य सिखाती है।

कुरीति वह है जो किसी का शोषण करती है, किसी को नीचा दिखाती है या किसी की प्रगति रोकती है।

जो लोग दहेज, छुआछूत, घूंघट प्रथा या लड़कियों को शिक्षा से रोकने जैसी बातों को ‘परंपरा’ कहते हैं, वे असल में समाज की जड़ों में जहर घोल रहे हैं। एक सभ्य समाज वह है जो समय के साथ अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें सुधारता है। जो समाज रुक जाता है, वह सड़ने लगता है।

 

मानसिक गुलामी और डर का माहौल

 

कुरीतियों के समर्थक अक्सर ‘लोक-लाज’ या ‘समाज क्या कहेगा’ के डर का इस्तेमाल करते हैं।

वे एक ऐसा ढांचा खड़ा करते हैं जहाँ इंसान अपनी मर्जी से जीने के बजाय दूसरों को खुश करने के लिए जीता है।

जहाँ सवाल पूछने की मनाही हो, वहाँ सभ्यता नहीं बल्कि ‘मानसिक गुलामी’ पनपती है।

एक सभ्य समाज में व्यक्ति को स्वतंत्र होकर सोचने और सही का साथ देने की आजादी होती है। लेकिन कुरीतियों के समर्थक इस आजादी को ‘बगावत’ का नाम देकर कुचल देते हैं।

 

‘पढ़े-लिखे’ होने और ‘सभ्य’ होने में अंतर

 

आज के दौर में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि कुरीतियों के सबसे बड़े रक्षक कई बार ऊँचे पदों पर बैठे ‘शिक्षित’ लोग होते हैं।

दहेज का बाज़ार: एक डॉक्टर या इंजीनियर लड़के के लिए करोड़ों की मांग करना क्या सभ्यता है! यह सिर्फ एक पढ़ा-लिखा व्यापार है।

दिखावा: शादी-ब्याह में कर्ज लेकर लाखों उड़ाना ताकि समाज में नाक ऊँची रहे, यह मानसिक खोखलेपन की निशानी है।

जब तक शिक्षा हमारे भीतर संवेदनशीलता पैदा नहीं करती, तब तक हम सिर्फ साक्षर हैं, सभ्य नहीं।

 

विकास की गाड़ी में ‘रिवर्स गियर’

 

कुरीतियों के समर्थक समाज की संरचना तो करते हैं, लेकिन वह संरचना ‘पिछड़ी’ होती है।

प्रतिभा का नुकसान: जब हम जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव करते हैं, तो हम देश की आधी से ज्यादा प्रतिभा को घर बिठा देते हैं या दबा देते हैं।

अपराध को बढ़ावा: कुरीतियाँ ही आगे चलकर बड़े अपराधों का रूप लेती हैं (जैसे भ्रूण हत्या या घरेलू हिंसा)।

 

सभ्य समाज की संरचना के लिए 3 जरूरी बदलाव

 

एक सच्चा सभ्य समाज वही बना सकते हैं जो इन सिद्धांतों को अपनाएं.

इंसानियत सबसे ऊपर: कोई भी रिवाज या कानून इंसान की गरिमा से बड़ा नहीं होना चाहिए। अगर कोई प्रथा किसी को चोट पहुँचाती है, तो उसे तुरंत त्याग देना ही सभ्यता है।

तर्क की कसौटी: “बड़े-बूढ़े कहते आए हैं” की जगह “यह आज के समय में कितना सही है”— इस पर विचार करना जरूरी है।

बदलाव का स्वागत: समाज एक बहती नदी की तरह होना चाहिए। पुराना कचरा (कुरीतियाँ) पीछे छोड़ना और नए विचारों को अपनाना ही जीवन है।

 

अपुन के अंतिम शब्द..

 

सभ्य समाज की नींव ‘डर’ पर नहीं, बल्कि ‘सम्मान’ पर टिकी होती है। कुरीतियों के समर्थक भले ही भीड़ जुटा लें, लेकिन वे एक ऐसा समाज कभी नहीं बना सकते जहाँ हर इंसान बिना किसी खौफ के, बराबरी के साथ सिर उठाकर जी सके।

सभ्यता का असली निर्माण तब शुरू होता है जब हम अपने भीतर के ‘रूढ़िवादी राक्षस’ को मारकर एक ‘तर्कशील इंसान’ को जन्म देते हैं।

 

– Mr. Indra Yadav/Correspondent- Ishan Times/indrayadaveditor@gmail.com/news editor/Open information..🙏..✍️..

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