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महंगाई की तपिश जहाँ बचपन रोटियाँ बेलते हुए राख हो गया!

महंगाई की तपिश जहाँ बचपन रोटियाँ बेलते हुए राख हो गया!

 

मुंबई (इंद्र यादव) ठाणे, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई, जहाँ गगनचुंबी इमारतें आसमान छूती हैं, वहीं उसकी परछाई में ‘जन अधिकारों’ की धज्जियाँ उड़ती तस्वीरें भी साफ दिखाई देती हैं। 14 साल की कविता, जो आज स्कूल की बेंच पर होनी चाहिए थी, वह एक अंधेरे कमरे के बाहर ईंटों के चूल्हे पर लकड़ियाँ झोंक रही है। यह केवल एक परिवार की गरीबी नहीं, बल्कि ‘सम्मान के साथ जीने के अधिकार’ (Article 21) की विफलता का जीता-जागता प्रमाण है।

 

संविधान ने दिया हक, पर महंगाई ने छीना निवाला

 

भारतीय संविधान हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन जब एक मजदूर पिता और सब्जी बेचने वाली माँ की पूरी कमाई सिर्फ मकान के भाड़े और दो वक्त के सूखे राशन में खत्म हो जाए, तो ‘उज्ज्वला’ जैसी योजनाएं केवल विज्ञापनों तक सीमित रह जाती हैं। कविता का परिवार आज हजारों रुपये का गैस सिलेंडर खरीदने में असमर्थ है, क्योंकि आसमान छूती महंगाई ने रसोई के बजट को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

 

शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकारों पर ‘धुएँ’ का ग्रहण

 

बाल्यावस्था का हनन: 15 वर्ष की आयु में कविता का चूल्हे पर समय बिताना उसके ‘शिक्षा के अधिकार’ और विकास के अवसरों को छीन रहा है।

स्वास्थ्य का संकट: बंद कमरों और गलियों में लकड़ी के चूल्हे से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के लिए जहर है। क्या इन गरीब मजदूरों को ‘स्वच्छ पर्यावरण’ और ‘बेहतर स्वास्थ्य’ का अधिकार नहीं है!

आर्थिक न्याय का अभाव: एक तरफ बड़े कॉरपोरेट्स को रियायतें दी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर बुनियादी खाद्य पदार्थों (आटा, दाल, तेल) पर बढ़ती महंगाई ने गरीबों की थाली छोटी कर दी है।

 

कहाँ गई सरकार की लोक-कल्याणकारी नीतियां

 

सरकार का काम केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि वे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें। कविता के परिवार की बेबसी यह सवाल पूछती है कि.

जब राशन महंगा है और मजदूरी स्थिर, तो गरीब अपना अस्तित्व कैसे बचाए! गैस सब्सिडी और मुफ्त सिलेंडर के दावों के बीच, आज भी करोड़ों हाथ लकड़ियाँ क्यों जला रहे हैं!

क्या ‘जन अधिकार’ केवल चुनाव तक सीमित हैं

 

बेबस जनता का दर्द और आक्रोश

 

मजदूरों और गरीबों का कहना है कि सरकार की नीतियां केवल मध्यम और उच्च वर्ग को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। महंगाई की मार सबसे ज्यादा उन पर पड़ती है जो रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं। कविता की आँखों में चूल्हे की जलन के साथ-साथ व्यवस्था के प्रति एक गहरा सन्नाटा और आक्रोश भी है।

कविता की यह तस्वीर किसी एक बच्ची की नहीं, बल्कि उन लाखों बच्चों की है जिनका भविष्य चूल्हे की राख में दब रहा है। यदि सरकार ने ‘जन अधिकार’ और ‘आर्थिक समानता’ के संवैधानिक वादों को गंभीरता से नहीं लिया, तो विकास का यह महल खोखला ही रहेगा।

“सवाल यह नहीं कि चूल्हा जल रहा है, सवाल यह है कि उस चूल्हे की आग में कितने बच्चों का भविष्य जल रहा है।”

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