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राजघाट से राजकोट जेल: संजीव भट्ट की रिहाई के लिए हिमांशु कुमार का ‘साइकिल सत्याग्रह’ का एलान।

 संजीव भट्ट की रिहाई के लिए हिमांशु कुमार का ‘साइकिल सत्याग्रह’

मुंबई (इंद्र यादव) देश के जाने-माने समाजसेवी हिमांशु कुमार ने एक बार फिर सत्ता की चूलें हिलाने और अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतरने का ऐलान कर दिया है। सोनी सोरी, चंद्रशेखर रावण और हाल ही में सोनम वांगचुक के हक में सफल मुहिम चलाने के बाद, अब अगला बड़ा मोर्चा पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की रिहाई के लिए खोला जा रहा है।
2 अक्टूबर: गांधी की समाधि से जेल की दहलीज तक
आगामी 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) को देश की राजधानी दिल्ली के राजघाट से एक ऐतिहासिक साइकिल यात्रा शुरू होगी। यह यात्रा दिल्ली से चलकर गुजरात की राजकोट जेल तक जाएगी, जहाँ संजीव भट्ट लंबे समय से कैद हैं। हिमांशु कुमार ने साफ किया है कि यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि सोए हुए ‘जमीर’ को जगाने की एक कोशिश है।

फेसबुक के ‘वीरों’ को चुनौती: “सड़क पर उतरने का माद्दा दिखाओ”

अपने तीखे और बेबाक अंदाज में हिमांशु कुमार ने उन लोगों को ललकारा है जो केवल सोशल मीडिया तक सीमित हैं। उन्होंने कहा!

“जिनका जमीर बाकी है और जो डरे नहीं हैं, जो फेसबुक के अलावा सड़कों पर उतरने का दम रखते हैं, इस यात्रा में उन सभी साथियों का स्वागत है।”

जीत का इतिहास: जब-जब लड़े, तब-तब झुकी हुकूमत
इस अभियान के पीछे आत्म-विश्वास की एक लंबी फेहरिस्त है। इस घोषणा के साथ पिछले सफल आंदोलनों की याद दिलाई गई:
सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी: आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ी और उन्हें जेल की सलाखों से बाहर निकाला।
चंद्रशेखर रावण: राजघाट से सहारनपुर जेल तक 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा की, जिसके बाद उनकी रिहाई संभव हुई।
कबीर कला मंच: जेएनयू से लेकर प्रेस क्लब तक अभियान चलाकर जेल में बंद साथियों को आजाद कराया।
सोनम वांगचुक: हालिया पदयात्रा और धरने के दबाव में सरकार को झुकना पड़ा।
“सत्ता का तिलिस्म टूटे न टूटे, भीतर का कायर टूटना चाहिए”
हिंमांशु कुमार ने स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई केवल हार-जीत के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के तकाजे के लिए है। उन्होंने क्रांतिकारी कविताओं के जरिए संदेश दिया कि जुल्म के सामने चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है। उन्होंने आह्वान किया कि फासीवादी और तानाशाह ताकतों के सामने हथियार डालने के बजाय, उनसे टकराना ही लोकतंत्र की असली रीत है।

एक मुश्किल लेकिन जरूरी सफर ,संजीव भट्ट की रिहाई का लक्ष्य भले ही कठिन नजर आता हो, लेकिन आंदोलनकारियों का मानना है कि ‘असंभव’ कुछ भी नहीं। फैज अहमद फैज की पंक्तियों के साथ इस मुहिम का आगाज किया गया है— ‘न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई’।
अब देखना यह होगा कि 2 अक्टूबर को राजघाट से उठने वाला यह ‘साइकिल सत्याग्रह’ राजकोट तक पहुँचते-पहुँचते देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था में क्या हलचल पैदा करता है।

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