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जाम में फंसी जिंदगी चौराहों पर अटका विकास: भदोही की सड़कों का मौन

विशेष संवाददाता जोश सच का राजेश जायसवाल ” खामोश”

 

कालीन नगरी भदोही आज एक अजीब विडंबना के बीच खड़ी है। विकास की परिभाषा ऊँची-ऊँची घोषणाओं और चौड़ी होती सड़कों में तलाश की जा रही है, लेकिन सच्चाई चौराहों पर पसरी लंबी कतारों में दम तोड़ती नजर आती है। नगरों का विस्तार हुआ है, बाजार चमके हैं, वाहन बढ़े हैं—पर व्यवस्था वहीं की वहीं ठहरी हुई है।

यदि किसी को जाम की असली तस्वीर देखनी हो तो उसे लिप्पन मोड़, गाजिया भदोही, ज्ञानपुर की पुरानी कचहरी, उद्यान पार्क, गोपीगंज-ज्ञानपुर रोड, राजपुरा चौराहा और अज़ीमुल्ला चौराहा जैसे स्थानों से होकर गुजरना चाहिए। सुबह की हड़बड़ी हो या शाम की थकान, इन चौराहों पर समय जैसे ठहर जाता है। वाहन एक-दूसरे के आगे निकलने की होड़ में फँस जाते हैं और सायरन बजाती एंबुलेंस भी भीड़ के आगे बेबस दिखती है।

विकास का शोर बहुत है, पर नियोजन की खामोशी उससे भी गहरी है। जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच एक अनकहा लचीलापन दिखाई देता है—ऐसा लचीलापन जो नियमों को मोड़ देता है, अतिक्रमण को अनदेखा कर देता है और उद्योगपतियों की मुस्कान में संतोष ढूँढ़ लेता है। नतीजा यह कि चौराहे, जो शहर की धड़कन होते हैं, आज अव्यवस्था के प्रतीक बनते जा रहे हैं।

सबसे अधिक दयनीय दृश्य तब दिखता है जब पुलिस और ट्रैफिक कर्मी भीड़ के बीच असहाय खड़े नजर आते हैं। संसाधनों की कमी, स्पष्ट यातायात योजना का अभाव और बढ़ती आबादी—इन सबके बीच उनका प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा साबित होता है। नियमों का पालन करवाने से पहले नियमों को व्यवहारिक बनाना जरूरी है। जब हर सड़क पर अनियोजित पार्किंग होगी, जब फुटपाथों पर दुकानें सजी होंगी, तब जाम केवल समस्या नहीं, नियति बन जाएगा।

वाहनों की बाढ़ ने शहर की गति को निगल लिया है। दोपहिया, चारपहिया, ई-रिक्शा, ट्रैक्टर—हर दिशा से आती रफ्तार जब एक बिंदु पर टकराती है, तो व्यवस्था की असल परीक्षा वहीं होती है। पर परीक्षा देने के बजाय हम परिणाम की घोषणा में व्यस्त दिखते हैं।

सवाल केवल यातायात का नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति का है। क्या नगरों का विकास केवल उद्घाटन पट्टिकाओं तक सीमित रहेगा? क्या चौराहों की नई सजावट ही समाधान है, या हमें वैज्ञानिक ट्रैफिक प्लान, सख्त अतिक्रमण मुहिम और जनजागरूकता की सामूहिक पहल की जरूरत है?

भदोही के चौराहे आज मौन होकर भी बहुत कुछ कह रहे हैं। वे बता रहे हैं कि विकास केवल इमारतों और निवेश से नहीं, बल्कि सुगम आवागमन, अनुशासन और दूरदर्शी योजना से मापा जाता है। जब तक चौराहों की धड़कन सामान्य नहीं होगी, तब तक शहर की रफ्तार भी अधूरी ही रहेगी।

शायद अब समय आ गया है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और नागरिक—तीनों मिलकर यह तय करें कि हमें जाम में खड़ा विकास चाहिए या व्यवस्थित गति से आगे बढ़ता नगर।

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