पटना में शैक्षणिक संस्थाओं (कोचिंग सेंटर विवाद) अब दूसरे मोड़ पर
नवादा से साजिद हुसैन
जफ़र/पिंटू नवादा के क़लम सेखान सर और रौशन सर वाले इस पूरे प्रकरण में मेरी सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि जांच पूरी होने से पहले ही एक सुनियोजित नैरेटिव गढ़कर खान सर को अपराधी सिद्ध करने की होड़ मच गई है। मैं स्वयं खान सर का आलोचक रहा हूँ, लेकिन न्याय का तकाज़ा यह है कि किसी व्यक्ति को आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर दोषी ठहराया जाए।
यदि घटनाक्रम को क्रमबद्ध रूप से देखा जाए तो विवाद की शुरुआत प्रिंस यादव की संदिग्ध मृत्यु से नहीं हुई थी। विवाद की वास्तविक शुरुआत तब हुई, जब आरोपों के अनुसार एक संस्थान से जुड़े लोगों द्वारा दूसरे संस्थान के बैनर, पोस्टर और होर्डिंग फाड़े गए, तोड़फोड़ की गई और वहां तैनात सुरक्षा कर्मियों के साथ मारपीट हुई। यदि यह प्रारंभिक घटना ही न हुई होती, तो संभवतः पूरा विवाद इस स्तर तक पहुंचता ही नहीं। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस आग में पहली चिंगारी किसने डाली?
कोई भी व्यक्ति अपने संस्थान और अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए सुरक्षा गार्ड रखता है। सुरक्षा गार्ड केवल दिखावे के लिए नहीं रखे जाते। यदि किसी संस्थान पर भीड़ पहुंच जाए, हंगामा करे, तोड़फोड़ करे और कर्मचारियों पर हमला करे, तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ही संकट की स्थिति में सुरक्षा प्रदान करना होता है। ऐसे में यदि सुरक्षा कर्मियों द्वारा हवाई फायरिंग किए जाने का दावा किया जा रहा है, तो यह जांच का विषय है कि वह आत्मरक्षा की सीमा में था या उससे आगे। लेकिन यह भी तथ्य है कि उस कथित फायरिंग में न किसी की मृत्यु हुई, न कोई गंभीर रूप से घायल हुआ और न ही किसी प्रकार की जनहानि की पुष्टि हुई। यदि भीड़ को तितर-बितर करने के उद्देश्य से हवाई फायरिंग की गई थी, तो उसकी वैधानिकता का निर्धारण अदालत करेगी, सोशल मीडिया नहीं।
घटना के बाद दोनों पक्षों की ओर से एफआईआर दर्ज हुई। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार, रोशन के भाई का नाम भी प्राथमिकी में आरोपितों के रूप में सामने आया। इसके बाद पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी की आशंका के बीच देश छोड़कर दूसरे देशों में छिपने, नेपाल जाने और बाद में संदिग्ध परिस्थितियों में होटल के कमरे में प्रिंस यादव की मृत्यु होने की खबर सामने आई। अब यह मृत्यु हत्या थी, आत्महत्या थी, दुर्घटना थी या किसी चिकित्सकीय कारण से हुई यह सब पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक जांच और आधिकारिक निष्कर्ष का विषय है।
प्रिंस यादव के साथ नेपाल में ठहरे लोगों के बयानों में यह भी कहा गया कि वह मानसिक स्वास्थ्य अथवा मिर्गी से संबंधित दवाइयां लेते थे और संभवतः दवाओं की ओवरडोज़ की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यह दावा सही है या गलत, इसका निर्णय भी जांच एजेंसियां करेंगी। लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही कुछ लोगों ने हत्या का निष्कर्ष निकाल लिया और उसका पूरा दोष खान सर के सिर मढ़ना शुरू कर दिया।
यदि वास्तव में हत्या हुई होगी, तो यह जल्दबाज़ी कहीं न कहीं वास्तविक अपराधियों के लिए भी लाभदायक सिद्ध हो सकती है। क्योंकि जब पूरा जनमत एक पूर्वनिर्धारित दिशा में मोड़ दिया जाता है, तो जांच की दिशा प्रभावित होने का खतरा पैदा हो जाता है और असली दोषी बच भी सकते हैं। इसलिए किसी एक व्यक्ति के प्रति व्यक्तिगत, वैचारिक या व्यावसायिक शत्रुता के कारण उसे पहले से अपराधी घोषित कर देना न्याय के हित में नहीं है।
सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि कुछ सस्ती लोकप्रियता के भूखे यूट्यूबरों और अवसरवादी सांप्रदायिक नेताओं ने इस पूरे मामले को हिन्दू-मुस्लिम रंग देना शुरू कर दिया। “जिहादी”, “आतंकवादी”, “पाकिस्तानी” जैसे शब्दों का प्रयोग करके समाज में जातीय और धार्मिक उन्माद फैलाने का प्रयास किया गया। लोगों की भावनाओं में बहाकर आंसू, उत्तेजना और आक्रोश को ‘कंटेंट’ में बदल दिया गया ताकि व्यूज़, राजनीतिक लाभ और सामाजिक ध्रुवीकरण हासिल किया जा सके।
विडंबना यह है कि यदि जांच के बाद खान सर के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य न मिलें, उन्हें गिरफ्तारी या अदालत से राहत मिल जाए, तो वही लोग प्रशासन, न्यायपालिका और सरकार की मिलीभगत का आरोप लगाने लगेंगे। अर्थात उनके लिए जांच का निष्कर्ष नहीं, बल्कि पहले से तय किया गया आरोप ही अंतिम सत्य है।
मेरा कहना केवल इतना है कि न किसी व्यक्ति की प्रसिद्धि उसे कानून से ऊपर बनाती है और न किसी के प्रति घृणा उसे बिना प्रमाण अपराधी सिद्ध कर देती है। यदि खान सर दोषी हैं तो उन्हें कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए; लेकिन यदि वे दोषी नहीं हैं, तो उन्हें भीड़, यूट्यूब ट्रायल और सांप्रदायिक प्रचार का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए।
न्याय का सिद्धांत स्पष्ट है जिसने पहली गलती की, जिसने हिंसा की शुरुआत की, जिसने कानून तोड़ा और जो भी वास्तविक अपराधी है, उसे निष्पक्ष जांच के बाद दंड मिलना चाहिए। लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाना न न्याय है, न विवेक और न ही सभ्य समाज की पहचान।
अदालतों का काम साक्ष्यों से सच तक पहुंचना है, भीड़ का काम फैसला सुनाना नहीं। भावनाएं क्षणिक हो सकती हैं, लेकिन न्याय सदैव तथ्यों, प्रमाणों और धैर्य की मांग करता है।









