खाकी के ‘कलेवर’ से हटेगा ‘कलावा’ और तिलक! बिहार DGP का फरमान
पटना (इंद्र यादव) बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) ने पुलिस महकमे में अनुशासन और साख को लेकर एक ऐसा आदेश जारी किया है, जिसने पूरे राज्य के गलियारों में बहस छेड़ दी है। अब ड्यूटी के दौरान बिहार पुलिस के जवान न तो माथे पर तिलक लगा पाएंगे और न ही कलाई पर कलावा (मौली) या कोई धार्मिक धागा बांध सकेंगे।
वर्दी की गरिमा सबसे ऊपर
DGP के इस सख्त निर्देश का सीधा संदेश है—”पुलिस की कोई जाति या धर्म नहीं होता।” पुलिस मुख्यालय का मानना है कि जब कोई जवान वर्दी पहनता है, तो वह किसी विशेष समुदाय का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि जनता का रक्षक होता है। वर्दी पर किसी भी तरह का धार्मिक प्रतीक उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर सकता है।
आदेश में क्या है खास
नो तिलक, नो कलावा: ड्यूटी के दौरान वर्दी के साथ किसी भी तरह के धार्मिक दिखावे पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी।
प्रोफेशनल लुक पर जोर: पुलिसकर्मियों को साफ-सुथरी वर्दी, पॉलिश किए हुए जूते और अनुशासित टर्नआउट में रहना होगा।
आम जनता में भरोसा: पुलिस के पास आने वाले हर फरियादी को यह महसूस होना चाहिए कि उसके सामने खड़ा अधिकारी बिना किसी भेदभाव के न्याय करेगा।
क्यों पड़ी इस आदेश की जरूरत
अक्सर देखा जाता है कि पुलिसकर्मी वर्दी के साथ हाथों में मोटे-मोटे धागे या माथे पर बड़े तिलक लगाकर ड्यूटी करते हैं। मुख्यालय के अनुसार, यह ‘पुलिस मैनुअल’ के खिलाफ है। एक लोक सेवक को दिखने में पूरी तरह ‘सेकुलर’ और ‘न्यूट्रल’ होना चाहिए ताकि आम जनता के मन में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर रत्ती भर भी संदेह न रहे।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
इस आदेश के बाद से ही सोशल मीडिया दो धड़ों में बंट गया है। एक पक्ष इसे अनुशासन और निष्पक्षता की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे व्यक्तिगत आस्था पर चोट मान रहा है। हालांकि, पुलिस विभाग ने साफ कर दिया है कि ‘खाकी’ का धर्म सिर्फ और सिर्फ सेवा है। नजरिया: सत्ता और प्रशासन का यह कदम पुलिस की छवि को बदलने की एक बड़ी कोशिश है। अब देखना यह होगा कि ज़मीनी स्तर पर इस आदेश का पालन कितनी कड़ाई से होता है और बिहार पुलिस का यह ‘नया अवतार’ जनता के बीच कितनी विश्वसनीयता बना पाता है।










