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जिंदगी भर घोंपे खंजर, अब कफ़न ओढ़ाने आए हैं!

मुंबई/इंद्र यादव/जनाजे में वो लोग भी शामिल होते हैं… जो जीने नहीं देते जिंदा होने पर। यह बात हमारे आधुनिक समाज की नस-नस में रचे-बसे एक कड़वे और डरावने सच का आईना है। जिसे हम रोज़ ‘लोकलाज’ और ‘संस्कार’ के नाम पर जीते हैं।
आज के सामाजिक ताने-बाने का यह सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जब तक कोई इंसान जिंदा रहता है, यह समाज उसकी खुशियों में रोड़े अटकाने, उसकी कमियां निकालने और उसे मानसिक रूप से तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ता। लेकिन जैसे ही उसकी सांसें थम जाती हैं, वही लोग सफेद कुर्ते-पायजामे में कंधे से कंधा मिलाकर, गंभीर चेहरा बनाए उसके जनाजे में सबसे आगे खड़े नजर आते हैं।

जिंदा इंसान से बैर, लाश से हमदर्दी क्यों

यह हमारे समाज की एक अजीब और बीमार मानसिकता है। जब एक व्यक्ति संघर्ष कर रहा होता है, अवसाद से जूझ रहा होता है, या समाज की लीक से हटकर कुछ करने की कोशिश करता है, तो उसे सबसे ज्यादा अपनों और पड़ोसियों के ताने सुनने को मिलते हैं।
जिंदा रहते: लोग क्या कहेंगे, यह किसी काम का नहीं है, इसने नाक कटवा दी— जैसे जुमलों से उसका जीना मुहाल कर दिया जाता है।
मरने के बाद: वही लोग गंगाजल छिड़ककर पवित्र बनते हैं और कहते हैं, “बेचारा बहुत अच्छा इंसान था, भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।
समाज को किसी के जिंदा होने से उतना फर्क नहीं पड़ता, जितना उसकी मौत को एक ‘इवेंट’ या ‘तमाशा’ बनाने में मजा आता है। जनाजे में उमड़ी भीड़ अक्सर इस बात का सबूत नहीं होती कि मरने वाला कितना लोकप्रिय था, बल्कि कई बार यह इस बात का सबूत होती है कि समाज अपनी आत्म-संतुष्टि और दिखावे के लिए मरा हुआ चेहरा देखना पसंद करता है।

आलोचना की भट्ठी और आंसू की राजनीति

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां इंसान की कीमत उसकी मौत के बाद तय होती है। जब तक कलाकार, लेखक, छात्र या कोई आम कामकाजी इंसान जिंदा है, उसकी कद्र नहीं होगी। उसे हर मोड़ पर अपनी काबिलियत और अपनी नैतिकता की परीक्षा देनी होगी। लेकिन मौत आते ही वही आलोचक सबसे बड़े शुभचिंतक बनकर सामने आ जाते हैं।
यह सवाल हम सबको खुद से पूछना होगा: जो आंसू किसी की अर्थी पर बहते हैं, काश वे दो बूंद सहानुभूति बनकर उसके जीते जी काम आ पाते। जो हाथ जनाजे को कंधा देने के लिए इतनी जल्दी आगे बढ़ते हैं, काश वे तब आगे बढ़े होते जब वह इंसान जिंदगी के सफर में अकेला थककर गिर रहा था।

वक्त आ गया है नजरिया बदलने का

इस कड़वे सामाजिक सच को बदलने की शुरुआत हमसे और आपसे ही होगी। हमें ‘मरणोपरांत सम्मान’ देने की इस खोखली परंपरा से बाहर निकलना होगा।
अगर कोई अच्छा काम कर रहा है, तो उसके जिंदा रहते उसकी पीठ थपथपाइए।
कोई परेशान है, तो उसके जनाजे में शामिल होने का इंतजार मत कीजिए, उसके जीते जी उसके घर जाकर चाय पीजिए और उसका हाल पूछिए।
मौत के बाद सोशल मीडिया पर ‘RIP’ लिखने और जनाजे में भीड़ बढ़ाने से बेहतर है कि हम किसी को जीते जी सुकून से सांस लेने दें।
जनाजे में उमड़ने वाली भीड़ कभी-कभी प्रायश्चित की भीड़ होती है, जो खुद को यह तसल्ली देने आती है कि ‘चलो, हमने आखिरी वक्त पर अपना फर्ज निभा दिया।’ लेकिन सच तो यही है कि अगर आप किसी को जीते जी दो पल की खुशी और सम्मान नहीं दे सकते, तो उसकी मौत पर बहाए गए आपके आंसू और जनाजे में दिया गया आपका कंधा, सिर्फ और सिर्फ एक ढोंग है। समाज को लाशों की कद्र करने के बजाय, जिंदगियों को सहेजना सीखना होगा।

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