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तमिलनाडु की सियासत में 49 साल बाद 1977 जैसा करिश्मा*

*तमिलनाडु की सियासत में 49 साल बाद 1977 जैसा करिश्मा*

 

*दक्षिण भारतीय सिनेमा के स्टार थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने तमिलनाडु की राजनीति में धमाकेदार इंट्री*

 

*राजेन्द्र सिहं*

 

 

लखनऊ । 4 मई को आए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बड़ा उलटफेर देखने को मिला। बंगाल में जहां भाजपा ने उम्मीद से कहीं अधिक जनादेश हासिल कर राज्य में पहली बार अपनी बहुमत की सरकार बनाने जा रही है, वहीं तमिलनाडु की सियासत में ऐसा पॉलिटिकल क्लाईमैक्स देखने को मिला कि सारे सियासी दिग्गजों की गणित धराशाई हो गई।

 

दो साल पहले वजूद में आई दक्षिण भारतीय सिनेमा के स्टार थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने तमिलनाडु की राजनीति में धमाकेदार इंट्री की है। नेता से अभिनेता बने थलापति विजय की पार्टी ने द्रविड़ सियासत के दिग्गजों को पछाड़ते हुए अपने पहले ही चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीत लीं। टीवीके ने एक ही झटके में 60 वर्षों से राज्य में

वंशवाद की राजनीति कर रहीं ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ियन प्रोग्रेसिव फेडरेशन (एआईएडीएमके) और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) को सत्ता की दौड़ से बाहर कर दिया।

 

234 विधानसभा सीटों वाले राज्य में टीवीके ने 108 सीटें हासिल की। विजय की पार्टी सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत का जादुई आंकड़ा 118 हासिल करने से तो चूक गई लेकिन सबसे बड़ी और सत्ता की मुख्य दावेदार बनकर उभरी है। टीवीके सुप्रीमो विजय ने राजभवन पहुंचकर कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया है।

2021 से सत्तारूढ़ एमके स्टालिन की डीएमके जहां 59 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई है वहीं एआईएडीएमके 47 सीटें जीतकर तीसरे नंबर पर आ गई। विजय ने चेन्नई की पेरम्बूर और त्रिची पूर्व से चुनाव लड़ा और दोनों सीटों पर भारी मतों से जीत दर्ज की। जबकि मुख्यमंत्री स्टालिन अपनी सीट तक नहीं बचा सके।

 

टीवीके की इस ऐतिहासिक जीत के साथ तमिलनाडु में 49 साल बाद एमजी रामचंद्रन जैसा करिश्मा दोहराया गया है। एमजी रामचंद्रन ने 1977 के विधानसभा चुनाव में भारी जीत हासिल कर राज्य में अपनी नई पार्टी खड़ी करके अभिनेता से मुख्यमंत्री बने थे, अब थलपति ने वहीं करिश्मा कर दिखाया है। थलपति विजय ने चेन्नई, मदुरै और कोंगू नाडु क्षेत्रों में भारी बहुमत हासिल कर राजनीति में नए युग की शुरुआत की है। दक्षिण भारतीय सिनेमा में विलेन की अपने ही अंदाज में तोड़ाई और पिटाई करने वाले थलपति विजय ने चुनावी मैदान में अपनी जीत के लिए भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। थलपति की जनसभाओं में उनकी लोकप्रियता के चलते भारी भीड़ उमड़ती थी। थलपति विजय का फिल्म ‘बिगिल’ के हिट डॉयलाग ‘ मैंने एक बार मैदान में कदम रख दिया तो जीतना ही होगा’ के साथ सीटी बजाना उनकी जनसभाओं में उमड़ती भीड़ का उत्साह आसमान पर पहुंचा देता था। इससे उनकी फैन फालोइंग वोटों में तब्दील हो गई। जेन-जी और युवा वोटर्स जो अपनी पारंपरिक पार्टियों से नाराज और बदलाव की तलाश में थे, उनके साथ तेजी से जुड़ते चले गए। इसके साथ ही विजय ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के वादे भी किए। विजय के सात वादों ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी के करीब पहुंचा दिया। सोना, सिलिंडर, महिलाओं को बसों में मुफ्त यात्रा, 12वीं तक के बच्चों को प्रत्येक वर्ष 15 हजार रुपये की आर्थिक मदद और बेरोजगारी भत्ता जैसे उनके वादे डीएमके को सत्ता से हटाने में बड़े मददगार बने। गांव- गांव, शहर की हर गली में समर्थक युवाओं की मजबूत टोली ने उनके हर वादे को घूम-घूमकर घर- घर तक पहुंचाया। इसी का परिणाम रहा कि तमिलनाडु के मतदाताओं ने न केवल अन्नाद्रमुक और भाजपा नेताओं के गठबंधन प्रस्ताव को ठुकरा दिया, बल्कि द्रमुक की सहयोगी पार्टी कांग्रेस के गठजोड़ के प्रयास को भी सिरे से खारिज किया। इस तरह थलपति विजय तमिलनाडु की राजनीति के सिरमौर बन गए। जल्द ही वह मुख्यमंत्री के पद की शपथ ले सकते हैं।

 

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है। और कई समाचार पत्रों के संपादक रहें हैं।)*

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