बुद्ध (श्रमिक) कब मुस्कुरायेंगे? 
पिछले दिनों दिल्ली, नोएडा, सूरत, पानीपत मथुरा व अन्य शहरी आद्योगिक इकाइयों में हमने कर्मचारियों और मजदूरों का उबाल देखा। सरकार को लगता है कि डंडे के ज़ोर से उन्होंने दावानल को दबा दिया है मगर आग अंदर ही अंदर सुलग रही है। नोएडा जाकर इस आग और गुस्से को जरा सा मैंने भी महसूस किया।संयोगवश इस बीच एक साथ मजदूर दिवस और बुद्ध पूर्णिमा पड़ी। मैंने सरकार और नोएडा प्रशासन के माथे पर एक बार फिर बल पड़ते देखा। वे फिलहाल इसको दबा ले गए- इसकी राहत के साथ साथ ही अंदर-अंदर सुलग रहे असंतोष की आहट उन्हें है। अपने विचारों को इस लेख के रूप में आपसे साझा कर रहा हूँ।
राष्ट्रीय दैनिक अख़बार देशबंधु का आभार इसे प्रकाशित करने के लिए।
पूरा लेख नीचे text में दिया जा रहा है। अख़बार में छपे लेख की प्रतिलिपि भी लगा रहा हूँ। शुक्रिया।
“चार दिन पहले मजदूर दिवस था और चाँद की चाल के चलते बुद्ध पूर्णिमा भी।
1 मई के दिन को संसार भर के श्रमिकों ने श्रम की गरिमा और श्रमिक अधिकारों को याद रखने और मजबूत करने के अवसर के रूप में तय किया। संसार के दुखों का कारण और निवारण का मार्ग ढूँढते-भटकते बुद्ध को पूर्णिमा के ही दिन ज्ञान प्राप्ति हुई थी।
बुद्ध के संवेदनशील मन ने संसार के दुख को देखा। दुख के कारणों की पड़ताल में वह भीतर तक उतरते गए। लंबे चिंतन-साधना-अनुभव के बाद दुखों से मुक्ति के लिए वह जीवन के आर्य सत्यों, अष्टमार्ग और पंचशील के साथ लौटे।
असमानता, लोभ-लाभ, संचय, चोरी, अधिग्रहण, जन्म, मृत्यु, जरा को उन्होंने दुख के कारणों में गिना। सही आजीविका, सही दृष्टि, सही कर्म, सही वाणी, सहअस्तित्व आदि को उन्होंने अपने सिद्धांत में अनिवार्य बनाया।
यह बुद्ध की बात हुई। हज़ारों वर्ष बीत गए, संसार अपने-अपने ढंग से बुद्ध को देखता, समझता, मानता चला आ रहा है। समय के प्रवाह में करुणा और समानता बुद्ध के दर्शन की सबसे बड़ी पहचान बन गई। जहाँ भी लंबे कानों, बड़ी-बड़ी बंद आखों और स्थिरता की नदी में डूबा वह पाषाण चेहरा हमें दिखता, शांति का अनुभव होता है।
फिर आया पूंजीवाद। मुनाफे पर आधारित उत्पादन व्यवस्था। मुनाफा वस्तुओं या सेवाओं के लेनदेन से बनता है। वस्तु, ‘product’ या Service का उत्पादन मनुष्य करते हैं। किसी भी उत्पादन में पूंजी और श्रम लगता है। कोई भी वस्तु, सेवा या माल बिना श्रम के पैदा नहीं हो सकता – चाहे वह जिस प्रकार का श्रम हो। वस्तु या सेवा के मूल्य में श्रम का मूल्य छुपा रहता है।
धीरे-धीरे वस्तुऐं, या ‘प्रोडक्ट’, सेवाएं, उनके ब्रांड और पूंजी प्रदाता कंपनियां प्रमुखता और मुख़्तारी हासिल करती जाती हैं; श्रम और श्रमिक अलक्षित हो जाते हैं। श्रमिक और उनका श्रम अलक्षित न रह जाए इसलिए उनकी यूनियनें, संगठन बनते हैं – जो बार-बार उनकी उपस्थिति की याद दिलाते हैं, वे संघर्ष-समझौता-सुलह की प्रक्रिया में शामिल रहते हैं। कभी उनकी बात सुनी जाती है, कभी दमन से तोड़ दिया जाता है, कभी पैसे से ख़रीद लिया जाता है। लिहाजा श्रम, पूंजी और मुनाफे के बीच एक तनाव हमेशा बना रहता है।
पूंजीवाले की एक ही चाहत है उसे ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफा मिले। एक प्रोडक्ट की लागत और उसकी अंतिम कीमत के बीच श्रमिक का श्रम वह बिन्दु है जिसे मुनाफा बढ़ाने के लिए सबसे ज़्यादा निचोड़ा जाता है। श्रम निचोड़ने में पूंजी मालिक मनमाना न हो जाए इसलिए तमाम संघर्षों के बाद संसार भर में बने श्रम कानून और तमाम कानूनी मर्यादाएँ। भारत के संविधान में भी श्रम कानून और श्रमिक अधिकारों को तय किया गया। इंदिरा गांधी जी द्वारा बनाया गया– “ठेका मजदूरी (नियंत्रण और उन्मूलन) एक्ट, 1970 इसमें बहुत अहम था। 1991 में नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद से श्रम क़ानून निशाने पर आ गए। साल 1991 में – अमेरिका, विश्व बैंक और आईएमएफ के दबाव में भारत ने अपनी अर्थव्यवथा का ताला विदेशी पूंजी के लिए खोला। हर चीज की तरह इसका भी एक बैकग्राउंड था। उनकी शर्त थी भारत अपने कड़े श्रम क़ानून शिथिल करे। इसे ‘लेबर रिफॉर्म’ का सुंदर सा नाम दिया गया। प्रचार से फैलाया गया कि भारत तरक्की इसलिए नहीं कर रहा है कि यहाँ श्रम क़ानून बहुत सख़्त हैं। यूनियनें काम नहीं करने देतीं। देश भर में हड़तालें होती रहती हैं, कोई काम नहीं करता आदि आदि।
और भी कई प्रसंग थे। खैर, क़िले में सुरंग बनाई जा चुकी थी। दिवार गिरते देर न लगी। अंततः क़िला भी ढह गया। किंतु पुरखों ने मजबूत किला बनाया था सो उसके मलबे की भी बोली लगी। सोने-चाँदी की चीज कौड़ियों के मोल बिकीं। धीरे-धीरे स्थिरता आई, बड़ी तकनीक और बड़ी पूंजी भी। पुराने श्रम कानूनों के लिहाज में मनमोहन सिंह जी ने ‘लेबर रिफॉर्म’ को मानवीय ढंग से धीर-धीरे आगे बढ़ाया और मनरेगा जैसे कानूनों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ धन डाला। मगर 2014 में आ गए नरेंद्र मोदीजी – जिनका राजनीतिक कैरियर ही पूंजीपतियों के सपोर्ट की देन था। आरएसएस और भाजपा अपनी स्थापना से ही श्रम कानूनों के विरोधी और पूँजीमालिकों के मुनाफ़े के समर्थक रहे हैं। ऊपर-ऊपर से इनकी राजनीति धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में होती दिखती है, उससे उनकी पहचान भी बनी मगर उनकी आर्थिक नीति हमेशा पूँजीमालिकों के हितसाधन का माध्यम रही चली आई है और वही इनका मुख्य उद्देश्य भी है। संसद में, नीतिनिर्माण में, फैक्ट्रीफ्लोर पर, कंपनी, खदान, निर्माण यूनिट या कारख़ाने में ये जिन श्रमिकों के हितों के ख़िलाफ़ काम करते हैं, उन्हीं श्रमिकों को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि की अस्मिताओं में उलझाकर अपनी ओर खींचते हैं। ये इनके काम करने का तरीका है।
दिन भर की मेहनत से रौंदे मन और शरीर लेकर बस्ती/मुहल्ले पहुँचे श्रमिकों को गणेश पूजा, लक्ष्मी पूजा, विश्वकर्मा पूजा, छठ, झांकियों, गीत-संगीत आदि के ज़रिए अपनी ओर खींच लेना आसान था। अभावों से भरा जीवन सहारा ढूँढता है। जब व्यवस्था और संगठन से सहारा नहीं मिलता तो आख़िरी चारा ईश्वर और आस्था का मजबूत स्तंभ होता है। घर-गांव-खेती-परिवेश से उजड़े और पलायित ये श्रमिक और कर्मी अपने मानसिक-सांस्कृतिक अलगाव और बिखराव को पाटने के लिए भी संस्कृति और धर्म का स्वभावतः सहारा लेते हैं। इसका एक बड़ा ही गझिन और दिलचस्प इतिहास है। श्रमिकों के बीच काम करने वाले मुक्तिकामी श्रमिक संगठनों की ऐतिहासिक कारणों से धर्म और संस्कृति की सतही समझ के चलते आरएसएस, शिव सेना और ऐसे ही अन्य संगठनों को धीरे-धीरे अपनी पकड़ बनाने में आसानी हुई।
सत्ता में आते ही मोदीजी ने दो काम शुरू किए। पहला – श्रम कानूनों को ख़त्म करना। दूसरा – कॉरपोरेट मोनोपॉली (Corporate Monopoly) खड़ी करना। सरकार द्वारा पोषित चंद बड़े आद्योगिक घराने एक-एक करके छोटे खिलाड़ियों को निगल जा रहे हैं। धीरे-धीरे भारतीय कारोबार जगत और बाजार से प्रतिस्पर्धा खत्म की जा रही है। इसका सबसे बड़ा शिकार छोटे-मध्यम आकार के उद्योग-धंधे हुए हैं। चार नए लेबर कोड लाकर अब पुराने श्रम कानूनों से मिले अधिकारों को अंतिम श्रद्धांजलि दी जा चुकी है। ठेका प्रथा और आउटसोर्सिंग स्थाई सत्य हो गया। अब बड़ी-बड़ी कंपनियां सीधे अपने कर्मी/श्रमिक न रखकर उन्हें आउटसोर्स करती हैं। अब वे प्रिंसिपल नियोक्ता होने से छूट पा चुकी हैं। पूंजी और श्रमिक के बीच अब इंटरफ़ेस एक दूसरी कंपनी है। अमुक कंपनी कोई सामान बनाती है। दूसरी अमुक कंपनी उसे वर्कफोर्स (श्रमिक) सप्लाई देती है। वर्कफोर्स देने वाली कंपनी श्रमिकों के तनख़्वाह से कटौती करती है। मुख्य कंपनी अपनी जिम्मेदारी से साफ़ बच जाती है। बेरोजगारी के पहाड़ तले पिस रहे देश के श्रमिकों के पास चुनने की आज़ादी नहीं है। जहाँ वस्तुओं का उत्पादन है वहाँ यह हाल है। जहाँ सेवाओं का उत्पादन हो रहा है वहाँ हाल विचित्र और लगभग रहस्यमयी है।
सूचना क्रांति और संचार की नई तकनीक – इंटरनेट – ने एक संकट पैदा किया है। अब मालिक और श्रमिक का कोई मिलन स्थल नहीं है। इंटरनेट आने के बाद मालिक मायावी हो गया। वह हमेशा मौजूद है और कभी उपस्थित नहीं है। जिन्हें गिग वर्कर्स कहा जाता है – ओला, उबर आदि टैक्सी वाले श्रमिक, ज़ोमैटो, स्विगी आदि डिलीवरी वाले श्रमिक, अर्बन कंपनी, आमेजन, फ्लिपकार्ट, नर्सिंग, होमकेयर, ब्यूटी और वेलनेस सेवाएं आदि वाले श्रमिक, अन्य डिजिटल सेवाओं के श्रमिक आदि अब किसके लिए काम करते हैं, किसके सामने माँग उठायें, किस पर दबाव बनाये – पता ही नहीं चलता। उनकी लड़ाई अब एक एल्गोरिदम (Algorithm) से है, एक सॉफ्टवेर प्रोग्राम से है। एल्गोरिदम से लड़ने का कोई तरीका अब तक खोजा नहीं जा सका है। ये एल्गोरिदम श्रमिक के शोषण का सबसे आधुनिक, सबसे तेज और सबसे सक्षम औजार बन गए हैं। ये श्रमिक को किसी फैक्ट्रीफ्लोर पर एकत्रित नहीं करते, एक जगह नहीं बुलाते, समूह नहीं बनाने देते- ये श्रमिक को उसके ही घर में, उसकी ही मोटरसाइकिल पर, अपना और अपनी शर्तों का ग़ुलाम बना लेते हैं।
एक विचित्र स्थिति में संसार पहुँच चुका है। हम भारत के लोग दो दुनियाओं में एक साथ जी रहे हैं। एक ओर हम 5G हैं, दूसरी ओर No Signal. सरल भाषा में हमारा एक पैर गाँव की व्यवस्था से जुड़ा है और दूसरा पैर शहर की व्यवस्था में। ग्रामीण व्यवस्था दरक रही है और शहरी व्यवस्था में पाँव रखने की जगह नहीं मिल रही। गाँव सिमट रहे हैं और शहर सपना हैं। भेदभाव और जातिदंश से मुक्ति का शहर का दावा ध्वस्त हो चुका है। अधिकांश लोग रोजगार और आज़ादी की तलाश में शहर आते हैं जो पहुँच से दूर है। आमदनी और बच्चों की अच्छी शिक्षा की चाहत उन्हें शहर लाती है जो उन्हें मिलती नहीं है। एक मृगमरीचिका सी खोज जारी रहती है जो हथेलियों की रेखाएँ घिस देती है।
फिर अचानक आता है कोई झटका। ये नगरी अँधेरी और चौपट दिखने लगती है। नोटबंदी हो जाती है – और भारत की मनुष्यता अपने सभी घाव लेकर सड़क पर पसर जाती है। कोविड महामारी के साथ अवैज्ञानिक सरकारी लॉकडाउन आता है और देश की जनता सड़कों पर कराह उठती है। देशवासियों के जीवित और मृत शरीरों के साथ ऐसा सलूक किया जाता है कि सोचकर सिहरन उठती है। कभी महाकुंभ या कोई बड़ा पर्व आ जाता है जो फिर से व्यवस्था पर गर्म तेल सा सच उड़ेल देता है। न जाने किस शक्ति से देश चलता रहता है और एक अदृश्य हिंसा चौतरफा घटती रहती है। परेशान होकर मनु जोसेफ जैसे विद्वान लेखक अपनी किताब में पूछते हैं “ग़रीब हमारा क़त्ल क्यों नहीं करते?”
एक दिन अमेरिका और इजराइल ईरान पर हमला कर देते हैं। ईरान ऐसे हमले की तैयारी दशकों से कर रहा था। वह हॉर्मुज़ की खाड़ी को बंद कर देता है और अरब देशों के तेलसंयंत्रों को निशाना बनाकर दुनिया भर में नेचुरल गैस, कच्चे तेल, नाफ़्ता, हीलियम आदि की सप्लाई रोक देता है। भारत में सेठ और कालाबाज़ारिये इस आपदा को अवसर में बदलते हुए 900 रु के गैस सिलेंडर को 4000 रु तक पहँचा देते हैं। और एक बार फिर भारत का दबाया हुआ श्रमिक सच प्रकट होकर विकट हो जाता है।
गुस्से और नफ़रत, घुटन और फ्रस्ट्रेशन से भरे श्रमिक सड़कों पर निकल आते हैं। गाड़ियाँ तोड़ देते हैं। शोरूम लूट लेते हैं। लंबे समय से उनके अंदर उबल रहा बवंडर – सिलेंडर की क्राइसिस के चलते – ट्रिगर प्वाइंट बन जाता है। यह उबाल हर जगह है। कहीं दिख रहा है कहीं नहीं। श्रमिकों के भीतर यह बवंडर उनके श्रम की लूट ने पैदा किया है, श्रम कानूनों और अधिकारों के विलोप ने पैदा किया है, असमानता ने किया है, महंगाई ने किया है। अमीरी-ग़रीबी के बीच की खाईं भारत में इतनी बड़ी हो गई है कि 50%-60% भारत उसमें साफ़-साफ़ डूबता दिखाई दे रहा है। जो लोग कगार पर खड़े हैं वह भी इस खाई में गिरने से बच नहीं सकते। आर्थिक विभाजन गहराता जा रहा है।
आज सबसे बड़ी देशभक्ति आर्थिक असमानता की इस चट्टान को तोड़ने का प्रयास करना है। आर्थिक अंतर्विरोध अट्टहास कर रहा है। पूरा आर्यावर्त लहूलुहान है। आर्थिक असमानता की चक्की सबको पीसकर बराबर कर देती है। वह बाक़ी पहचानों को भी हल्का कर देती है। लाख धर्म और जाति की, छुआछूत की दीवारें हो, शोषण की लौहमशीन जब श्रमिक का खून पीने उतरती है तो उनमें थोड़ी एकता पैदा हो जाती है। जैसा अभी हमने पल भर के लिए NCR में देखा। सत्ता के दावों की पोल खुल गई है।
900 रू के एक सिलेंडर ने दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था की असलियत सामने रख दी।
900 रू के एक सिलेंडर ने हमारी 350 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था की पोल खोल दी।
एक सिलेंडर के चलते नए लेबर कोड, मुनाफ़े, मीडिया, पूरे सिस्टम, न्यू इंडिया का सच सामने आ गया।
सिलेंडर संकट इस समय भारत के भीतर एक्सिस है पूरे Neoliberal Framework के संकट को समझने का। सिलेंडर संकट कैंसर से भी गंभीर बीमारी का लक्षण है। आज यह बीमारी बड़े ऑपरेशन की माँग कर रही है मगर भारत का राजनीतिक तंत्र Pain Killer बाँटने का मुक़ाबला कर रहा है।
क्या Pain Killer देने से बीमारी दूर होगी?
लंबे समय तक चलने वाली कोई राहत मिलेगी?
शरीर सर्जरी की माँग कर रहा है मगर दर्द दबाने की दवा दी जा रही है।
तो लड़ाई इस बात की रह जाती है कि किसका Pain Killer अच्छा है।
किसके Pain Killer की डिलीवरी अच्छी है। परिणाम सामने है।
आज यह बहुत जरूरी हो चला है कि एक नया Socio – Economic Proposal लेकर आया जाये। एक नया प्लान सक्षम भारत के लिए, सुखी भारत के लिए, सेहतमंद भारत के लिए, शिक्षित भारत के लिए। एक नया सवेरा। एक नया रास्ता – हर एक भारतवासी की समृद्धि के लिए। एक Grand Deal. आमदनी और इज्जत, शिक्षा और सेहत को लेकर ठोस प्रस्ताव देश के सामने रखा जाए।
70%-80% मेहनतक़श आबादी के लिए ठोस प्रस्ताव। ग्रामीण आबादी के लिए ठोस प्रस्ताव। जहाँ न्यूनतम आय हो, हर गरीब परिवार को सीधी और ठोस आर्थिक मदद हो, सेहत की गारंटी हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का कायापलट, अच्छी शिक्षा की गारंटी हो, भर्तियों के लिए कोचिंग और ट्यूशन के बोझ से मुक्ति मिले, छोटे कारोबारी, युवा कारोबारियों को बिना ब्याज लोन, अन्य मदद आदि मिले, जाति जनगणना हो, आरक्षण का दायरा बढ़े, नौकरियों में महिलाओं की हर स्तर पर 40% भागीदारी हो। उसी निरंतरता में गाँव की आमदनी बढ़ानी पड़ेगी। गाँव में नया इंफ्रा देना होगा। मंडियाँ, बाजार तैयार करने पड़ेंगे। अच्छे से अच्छी शिक्षा, सेहत का इंतज़ाम करना होगा। गाँव में रहने में आमदनी और इज्जत दोनों पैदा करनी होगी।
तब कहीं जाकर इस दयार में जरा सा क़रार पैदा होगा। जब कहीं जाकर हमारे बुद्ध जरा सा मुस्कुरायेंगे। और उस मुस्कुराहट के पीछे कोई बम विस्फोट नहीं बल्कि करुणा, मानवता और समानता की ऐसी ललक होगी जिसकी आभा में यह महादेश चमक उठेगा।”








