यूपी/इंद्र यादव/कहते हैं कि विकास जब आता है, तो गाजे-बाजे के साथ आता है। लेकिन कालीन नगरी भदोही के लोगों को क्या पता था कि विकास उनके साथ ऐसा ‘मोये-मोये’ कर जाएगा! भदोही के ग्रामीण इलाक़ों में पिछले 8 दिनों से बिजली ऐसी गायब हुई है, जैसे परीक्षा के बाद स्कूल की कॉपियां गायब हो जाती हैं। आज जनता दर्द में भी है और बिजली विभाग की इस ‘लीला’ पर मुस्कुराने को मजबूर भी है।
गैस से इंडक्शन, और इंडक्शन से… सीधे अंधकार!
किस्सा बड़ा दिलचस्प और उतना ही दर्दनाक है। कुछ समय पहले बड़े चाव से गली-गली पाइपलाइन बिछाई गई। लोगों से कहा गया—”स्मार्ट बनो, गैस सिलेंडर के झंझट से मुक्ति पाओ।” लोगों ने खुशी-खुशी गैस लाइन को अपनाया।

फिर जमाना और बदला। बिजली विभाग ने चौबीस घंटे बिजली का ऐसा सपना दिखाया कि लोगों ने गैस चूल्हा किनारे रखकर घर में चमचमाते इंडक्शन चूल्हे खरीद लिए। चाय बनानी हो या दाल, बटन दबाओ और काम शुरू। सब कुछ कितना ‘डिजिटल’ लग रहा था।
लेकिन, पिछले 8 दिनों से कहानी में ऐसा ट्विस्ट आया है कि अच्छे-भले डिजिटल इंडिया के नागरिक आदिमानव काल में पहुंच गए हैं। अब न गैस लाइन काम आ रही है, न इंडक्शन बाबा चल रहे हैं, क्योंकि दोनों की ‘परम आत्मा’ यानी बिजली ही गायब है।
पेट खाली, मोबाइल डेड, और रात में मच्छरों का तांडव
हंसी-मजाक अपनी जगह है, लेकिन भदोही की जनता का दर्द इस वक्त आंसू ला देने वाला है।
जिन घरों में पूरी तरह इंडक्शन पर निर्भरता हो गई थी, वहां पिछले 8 दिनों से कच्चे राशन के डिब्बे जनता को चिढ़ा रहे हैं। पड़ोसियों से मांगकर या पुराने लकड़ी-कोयले के इंतजाम में महिलाएं परेशान हैं।
स्मार्टफोन चार्ज करने के लिए लोग पूरे शहर में ऐसे भटक रहे हैं जैसे कोई खोया हुआ खजाना ढूंढ रहा हो। रिश्तेदार फोन लगा रहे हैं तो ‘नॉट रीचेबल’ आ रहा है, जिससे लोग परेशान हैं कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई।
गर्मी के इस मौसम में बिना पंखे और कूलर के रातें कयामत जैसी कट रही हैं। ऊपर से भदोही के मच्छर रात भर कान में आकर बिजली विभाग की तारीफों के कसीदे पढ़ते हैं, सो अलग! बच्चे सो नहीं पा रहे हैं, बुजुर्गों का दम फूल रहा है।
एक पीड़ित स्थानीय निवासी का दर्द:
“साहब! हम तो समझ ही नहीं पा रहे कि हम भदोही में रह रहे हैं या किसी टाइम मशीन में बैठकर 200 साल पीछे चले गए हैं। पहले लालटेन जलाते थे तो कम से कम मिट्टी का तेल मिल जाता था, अब तो वो भी नसीब नहीं है।”
बिजली विभाग का ‘अनोखा’ मौन व्रत
आमतौर पर बिजली कटती है तो लोग टोल-फ्री नंबर मिलाते हैं। लेकिन यहां तो पूरा हफ्ता बीत गया। ऐसा लगता है जैसे बिजली विभाग के ट्रांसफार्मर ने सन्यास ले लिया है और वह मोक्ष की प्राप्ति के लिए हिमालय चला गया है। अधिकारी फोन उठाने के बजाय ‘नोट रीचेबल’ मोड में हैं—शायद उनका खुद का मोबाइल भी चार्ज न हो!
जनता का सवाल: आखिर कब तक
इस भीषण गर्मी में 8 दिन तक बिना बिजली के रहना किसी सजा से कम नहीं है। भदोही की भोली-भाली जनता अब हाथ जोड़कर बिजली विभाग और प्रशासन से पूछ रही है—”हुजूर! हमसे क्या खता हुई।अगर सजा ही देनी थी, तो पहले ये इंडक्शन और गैस के हसीन सपने क्यों दिखाए।
अब देखना यह है कि भदोही के इस अंधकार को दूर करने के लिए विभाग की नींद कब टूटती है, या फिर जनता को सचमुच ‘पाषाण काल’ की लाइफस्टाइल अपनाने की ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी।










