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शहनाई की गूंज और पिया का घर: यादों में बसा वो सबसे प्यारा लम्हा

शहनाई की गूंज और पिया का घर: यादों में बसा वो सबसे प्यारा लम्हा

उत्तर प्रदेश (इंद्र यादव) गांवों में जब गर्मी की तपिश बढ़ती है और खेतों से गेहूँ कटकर खलिहानों में पहुँच जाता है, तब शुरू होता है ‘लगन’ का असली शोर। गाँवों में शादियाँ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा त्योहार हैं जिसमें पूरा मोहल्ला और टोला एक परिवार बन जाता है।
अगर हम शहरों की चकाचौंध को छोड़कर गाँव की शादी को देखें, तो उसमें सादगी और अपनापन कूट-कूट कर भरा होता है।

घर की पुताई और तैयारी का उत्साह

शादी की तारीख तय होते ही सबसे पहले घर के कच्चे-पक्के कोनों को चूने और गेरू से रंगा जाता है। घर की दीवारें नई मुस्कान ओढ़ लेती हैं। मोहल्ले की औरतें मिलकर हल्दी पीसती हैं और ढोलक की थाप पर ‘बन्ना-बन्नी’ के गीत गाती हैं। इन गीतों में दूल्हे की तारीफ और दुल्हन के आने की खुशी होती है।

बारात का स्वागत और ‘जनवासा’

गाँव में बारात किसी होटल में नहीं रुकती। बारात के लिए गाँव का स्कूल, पंचायत भवन या किसी बड़े बाग को साफ करके ‘जनवासा’ बनाया जाता है।
वो माहौल: पेड़ों के बीच बँधी रंग-बिरंगी झंडियाँ, बिछी हुई दरियाँ और ठंडे पानी के घड़े।
शरबत की मनुहार: बारात के पहुँचते ही सबसे पहले पीतल के गिलासों में चीनी और नींबू का ठंडा शरबत पिलाया जाता है। यह शरबत उस तपती दोपहर में सारी थकान मिटा देता है।

पंगत का खाना: कुल्हड़ वाली यादें

गाँव की शादी का खाना किसी फाइव स्टार होटल के खाने पर भारी पड़ता है। यहाँ खड़े होकर नहीं, बल्कि जमीन पर लाइन में बैठकर ‘पंगत’ में खाना खाया जाता है।
खास स्वाद: लकड़ी की आंच पर बड़े-बड़े कड़ाहों में बनी सब्जी और दाल। पत्तलों पर परोसी गई गरमा-गरम पूड़ियाँ और बूंदी का रायता।
दही-बड़ा और कद्दू: यूपी की ग्रामीण शादियों में ‘कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी’ और ‘उरद की दाल के बड़े’ के बिना खाना अधूरा माना जाता है। खिलाने वाले लड़के बार-बार आकर पूछते हैं— “भैया, एक पूड़ी और लेंगे?” यह जिद ही असली प्यार है।

हंसी-मजाक और ‘गारी’

जब बारात खाना खाने बैठती है, तो गाँव की चाची-ताई और बहनें मिलकर ‘गारी’ गाती हैं। ये गालियाँ अपमानजनक नहीं, बल्कि मजाक भरी होती हैं। दूल्हे के पिता और उसके दोस्तों को गानों के जरिए खूब चिढ़ाया जाता है। हंसी-ठिठोली का यह दौर पूरी रात की थकान को हंसी में बदल देता है।

विदाई का भारी मन

सुबह होते-होते जब विदाई की बेला आती है, तो पूरा गाँव इकट्ठा हो जाता है। मिट्टी के रास्ते पर जब गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, तो पीछे खड़ी माँ और सखियों की आँखें नम होती हैं। उस वक्त बजने वाला शहनाई का सुर दिल को चीर जाता है। भले ही बेटी एक घर से जा रही हो, लेकिन पूरे गाँव को लगता है कि उनके आंगन की रौनक कम हो गई है।

क्यों खास हैं ये यादें

आजकल शादियाँ ‘पैकेज’ का हिस्सा बन गई हैं, जहाँ सब कुछ खरीदा जा सकता है। लेकिन गाँव की शादी में लोग आज भी अपना ‘समय और श्रम’ देते हैं। कोई सब्जी काट रहा है, कोई पानी पिला रहा है, तो कोई मेहमानों को हाथ का पंखा झेल रहा है।
यही निस्वार्थ भाव और सादगी यूपी के गाँवों की शादियों को हमेशा के लिए हमारी यादों में बसा देती है। उस पसीने की खुशबू और मिट्टी की सोंधी महक में जो सुख है, वह आलीशान महलों में कहाँ!
क्या आपको भी याद है वो अपनापन, या आपके गाँव में अब चीजें बदल गई हैं!

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