उत्तर प्रदेश /इंद्र यादव/एक बार फिर वही पुराना राग, वही जानी-पहचानी स्क्रिप्ट और वही चिर-परिचित तेवर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने एक बार फिर से ‘सड़क पर नमाज’ को लेकर अपनी तीखी बयानबाजी का तीर छोड़ दिया है। उनका कहना है—”प्यार से माने तो ठीक, नहीं तो दूसरा तरीका अपनाएंगे।” सुनने में यह किसी फिल्म का डायलॉग लग सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि यह आज की राजनीति का असली चेहरा बन चुका है।
एक ही राग बार-बार क्यों
आम तौर पर एक समझदार और गंभीर नेता किसी मुद्दे पर एक बार बोलता है, कानून अपना काम करता है और बात खत्म हो जाती है। लेकिन यहाँ कहानी अलग है। यहाँ तो ऐसा लगता है कि जब तक इस तरह के ध्रुवीकरण करने वाले बयान न दिए जाएं, तब तक राजनीति की गाड़ी आगे बढ़ती ही नहीं।
बड़ा सवाल: क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति अब सिर्फ और सिर्फ इसी एक ध्रुव के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है? क्या विकास, रोजगार और जनता के बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने का यह सबसे आसान ‘शॉर्टकट’ बन चुका है!
असली मुद्दों से दूरी, बयानों की मजबूरी!
जब-जब जनता स्वास्थ्य, शिक्षा, पेपर लीक, महंगाई और बेरोजगारी जैसे गंभीर विषयों पर जवाब मांगती है, तब-तब अचानक से ऐसे संवेदनशील और तीखे बयान सामने आ जाते हैं।
जनता पूछे सवाल: युवाओं को रोजगार कब मिलेगा!
नेता जी का जवाब: हम सड़क पर नमाज नहीं होने देंगे!
जनता पूछे सवाल: महंगाई और पेपर लीक का क्या हुआ!
नेता जी का जवाब: प्यार से मानो, नहीं तो दूसरा तरीका अपनाएंगे!
‘दूसरा तरीका’ क्या है महाराज
कानून और संविधान से चलने वाले देश में “दूसरा तरीका” अपनाने की धमकी देना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ठेंगा दिखाना है। जब देश में अदालतें हैं, कानून है, और पुलिस प्रशासन है, तो फिर इस तरह की ‘चेतावनी’ वाली भाषा सिर्फ एक खास वोट बैंक को खुश करने और सुर्खियां बटोरने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं लगती।
जब किसी के पास दिखाने के लिए असल काम और दूरगामी नीतियां कम पड़ जाती हैं, तो राजनीति को जिंदा रखने के लिए ऐसे ही मुद्दों का सहारा लेना पड़ता है। जनता अब समझदार है, वो बयानों की इस राजनीति के पीछे की क्रोनोलॉजी को बहुत अच्छे से समझती है!










