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अन्नदाता की आंखों में आंसू! जब खून-पसीने से सींची 600 बोरी फसल को किसान ने खुद लगा दी आग!

मुंबई (इंद्र यादव) महाराष्ट्र,जिस प्याज को महाराष्ट्र का किसान बड़े लाड़-प्यार से सींचकर ‘लाल सोना’ कहता है, आज वही प्याज किसानों की आंखों में खून के आंसू ला रहा है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि महीनों की कड़ी मेहनत और लाखों के खर्च के बाद जब किसान मंडी पहुंच रहा है, तो उसे अपनी फसल की कीमत कौड़ियों के भाव मिल रही है। बेबसी और गुस्से का आलम यह है कि कोई अपनी मेहनत को आग के हवाले कर रहा है, तो कोई फसल बेचकर कर्जदार होकर घर लौट रहा है।

गुस्से की आग: जब किसान ने जला दी 600 बोरी फसल

धाराशिव जिले के भूम तालुका से एक रूह कंपा देने वाली तस्वीर सामने आई है। यहाँ के टिंटराज गांव के किसान भगवान साबले ने अपनी 4 एकड़ की मेहनत को अपनी ही आंखों के सामने जलते देखा।
लागत: करीब 3 से 4 लाख रुपये।
पैदावार: 600 बोरी प्याज।
बाजार भाव: महज 1 रुपये प्रति किलो।
भगवान साबले का कहना है कि इस भाव में प्याज बेचना घाटे पर नमक छिड़कने जैसा था। मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी जेब से भरना पड़ता, इसलिए हताशा में उन्होंने पूरी फसल को आग लगा दी। जो प्याज बाजार की रौनक बनना था, वह सरकारी तंत्र की विफलता के कारण राख के ढेर में तब्दील हो गया।

मंडी का क्रूर मजाक: 12 क्विंटल प्याज बेचा और जेब से देना पड़ा 1 रुपया

छत्रपति संभाजीनगर के पैठण तालुका से एक और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। वरुडी गांव के किसान प्रकाश गलधर 1262 किलो (करीब 25 बोरी) प्याज लेकर मंडी पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि बच्चों की स्कूल फीस और घर का खर्च निकल जाएगा, लेकिन हिसाब-किताब ने उनके होश उड़ा दिए।
किसान ने 1262 किलो प्याज महज 1 रुपये किलो के भाव पर बेचा, जिससे हुई 1262 रुपये की कमाई के मुकाबले 1263 रुपये का खर्चा आ गया और अंत में उसे अपनी जेब से 1 रुपया अतिरिक्त चुकाना पड़ा।
सोचिए, तीन महीने की हाड़-तोड़ मेहनत का सिला यह मिला कि किसान को अपनी फसल मुफ्त में देनी पड़ी और ऊपर से 1 रुपया जुर्माना (खर्च के रूप में) भी भरना पड़ा।

आखिर क्यों बर्बाद हो रहा है किसान

महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है, लेकिन आज यहाँ का किसान व्यवस्था की मार झेल रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
बंपर पैदावार और मांग में कमी: इस साल उत्पादन अधिक हुआ है, जिससे मंडियों में प्याज की आवक बढ़ गई है।
निर्यात नीतियों का पेंच: सरकार की अस्थिर निर्यात नीतियों के कारण विदेशी बाजारों में भारतीय प्याज की पकड़ कमजोर हुई है।
स्टोरेज का अभाव: प्याज को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज नहीं हैं, जिससे किसान फसल रोकने की स्थिति में नहीं है।
बढ़ती लागत: बीज, खाद, कीटनाशक और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन प्याज के दाम 10 साल पुराने स्तर पर पहुंच गए हैं।

कब जागेगी सरकार

इन घटनाओं ने राज्य की कृषि नीति और बाजार समितियों (APMC) के कामकाज पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। किसान संगठनों में भारी आक्रोश है। उनकी मांग स्पष्ट है:
प्याज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय हो।
सरकार तुरंत प्याज खरीद केंद्र खोले।
प्रभावित किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा दिया जाए।
परिणाम:अगर वक्त रहते सरकार ने दखल नहीं दिया, तो ‘लाल सोना’ उगाने वाला यह किसान कर्ज के दलदल में इतना धंस जाएगा कि उसे बाहर निकालना मुश्किल होगा। आज जो आग धाराशिव के खेतों में लगी है, वह कल पूरे राज्य के किसानों के गुस्से की चिंगारी बन सकती है।

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