मुंबई (इंद्र यादव) प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर देश की जनता को ‘सादगी’ और ‘बचत’ का पाठ पढ़ाया है। लेकिन अगर आप इन पांच सुझावों की गहराई में जाएंगे, तो समझ आएगा कि यह कोई भविष्य की रणनीति नहीं, बल्कि अपनी नाकामियों को ढंकने और आने वाले आर्थिक संकट का ठीकरा जनता के सिर फोड़ने की तैयारी है।
जब सरकार अपनी गलत नीतियों से खजाना खाली कर देती है, तो वह जनता से ‘त्याग’ की उम्मीद करने लगती है।
सोना: डॉलर बचाने की आड़ में अपनी विफलता छुपाना
प्रधानमंत्री कहते हैं सोना मत खरीदो ताकि विदेशी मुद्रा बचे। सच तो यह है कि रुपये की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरकर पाताल छू रही है। जब सरकार रुपये को संभालने में नाकाम रही, तो अब जनता के निवेश पर नजर है। भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल गहना नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त की सबसे सुरक्षित पूंजी है। क्या सरकार अपनी साख इतनी खो चुकी है कि उसे अब जनता की निजी बचत से डर लगने लगा है!
ईंधन: जनता से कारपूलिंग, और टैक्स से तिजोरी भरना
तेल बचाने और कारपूलिंग की सलाह उस सरकार की ओर से आ रही है जो पेट्रोल-डीजल पर दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स वसूलती है। कच्चे तेल के दाम जब गिरते हैं, तब जनता को फायदा नहीं दिया जाता, लेकिन जब अर्थव्यवस्था चरमराती है, तो पर्यावरण और ‘देशभक्ति’ के नाम पर आपको पैदल चलने की सलाह दी जाती है। यह सुझाव नहीं, बल्कि महंगे ईंधन की आग से पल्ला झाड़ने का तरीका है।
खाद्य तेल: 10 साल बाद जागी आत्मनिर्भरता
खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता आज की बात नहीं है। पिछले एक दशक से ‘मेक इन इंडिया’ का ढोल पीटने वाली सरकार आज बता रही है कि हम तेल के लिए विदेशों पर निर्भर हैं। दाल और तेल की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की थाली से स्वाद छीन लिया है। यह अपील असल में कृषि क्षेत्र में अपनी विफलता का कबूलनामा है।
खेती और उर्वरक: मिट्टी नहीं, साख बचाने की कोशिश
रासायनिक उर्वरकों को कम करने की बात तब की जा रही है जब सरकार सब्सिडी का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। खाद की किल्लत और ब्लैक मार्केटिंग से जूझते किसान को ‘प्राकृतिक खेती’ का ज्ञान देना ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। बिना किसी ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर के किसानों को उनके हाल पर छोड़ देना ही क्या ‘खाद्य सुरक्षा’ है!
विदेश यात्रा: पर्यटन या मंदी का खौफ
‘वेड इन इंडिया’ और ‘देश में घूमो’ जैसे नारे सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन इसके पीछे की असलियत ‘पैसे का बाहर जाना को रोकना है। सरकार को डर है कि लोग अपना पैसा विदेशों में खर्च कर रहे हैं क्योंकि देश के भीतर मंदी और महंगाई ने मिडिल क्लास की कमर तोड़ दी है। जो नेता खुद साल में कई बार विदेशी दौरों पर रहते हों, उनका जनता को रोकना दोगलापन नहीं तो क्या है!
अनुशासन या मजबूरी
यह ‘अनुशासन’ नहीं, बल्कि एक आर्थिक आपातकाल की आहट है जिसे ‘अपील’ का नाम दिया जा रहा है। सरकार चाहती है कि आप कम खाएं, कम घूमें, कम खर्च करें और अपनी बचत को भी दबाकर रखें, ताकि सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और बड़े उद्योगपतियों को दिए गए लोन माफी का बोझ जनता सह सके।
सावधान रहिए! ये सुझाव आपकी भलाई के लिए नहीं, बल्कि आपको आने वाली भीषण महंगाई और आर्थिक मंदी के लिए मानसिक रूप से तैयार करने का एक जाल हैं।










