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भंडपुरा का ‘कैद’ बचपन: 30 साल से राहें बंद, और हम बस देखते रह गए!

भंडपुरा का ‘कैद’ बचपन: 30 साल से राहें बंद, और हम बस देखते रह गए!

​उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में एक छोटा सा गांव है—भंडपुरा। सुनने में यह नाम किसी साधारण गांव जैसा लगता है, लेकिन इस गांव की हकीकत किसी खुली जेल से कम नहीं है। पिछले 30 वर्षों से यहां के ग्रामीण विकास की मुख्यधारा से कटे हुए हैं, और इसका कारण है—गांव के ठीक बाहर बना रेलवे पासिंग।

एक अदृश्य दीवार: ‘चुंगी’ की मांग, गांव की मजबूरी

​पिछले तीन दशकों से भंडपुरा के लोगों के लिए हाईवे पर पहुंचना किसी जंग जीतने जैसा है। रास्ता बंद है, और गांव की आवाजाही को रोकने वाली यह ‘अदृश्य दीवार’ हर दिन सैकड़ों लोगों की जान जोखिम में डाल रही है। गांव के लोगों की मांग है कि यहां एक रेलवे चुंगी (गेट) पास कर दी जाए, ताकि लोगों को आने-जाने का एक सुरक्षित और वैध रास्ता मिल सके।

डर के साये में पलता बचपन

​सबसे दर्दनाक पहलू है—हमारे बच्चों का भविष्य। जो उम्र किताबों के साथ खेल के मैदान में बीतनी चाहिए थी, वह उम्र भंडपुरा के बच्चे डर के साये में काट रहे हैं।

  • स्कूल का रास्ता: हर सुबह जब बच्चे स्कूल के लिए निकलते हैं, तो उनके माता-पिता की सांसें तब तक अटकी रहती हैं जब तक वे वापस न आ जाएं।
  • अनजान खतरा: बंद रास्ता होने के कारण बच्चों को जोखिम भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है। न जाने कितनी बार बच्चे फिसलते हैं, गिरते हैं, और न जाने कितनी बार उन्होंने रेल की पटरियों के करीब खुद को मौत के साये में पाया है।

30 साल का लंबा इंतजार

​तीन दशक बीत चुके हैं। सरकारें आईं, सरकारें गईं, लेकिन भंडपुरा की किस्मत नहीं बदली। हाईवे हमारे घर के करीब है, लेकिन उस तक पहुंचने के लिए हमें मीलों लंबा और खतरनाक चक्कर काटना पड़ता है। क्या एक चुंगी (रेलवे पासिंग) इतनी महंगी है कि वह हमारे बच्चों की सुरक्षा से भी कीमती हो गई?

क्या यह विकास है?

एक तरफ देश बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी के सपने देख रहा है, और दूसरी तरफ भंडपुरा के ग्रामीण आज भी एक छोटी सी ‘चुंगी’ के लिए 30 साल से दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

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