भदोही/इंद्र यादव/यूपी की राजनीति में ‘बाहुबली’ शब्द जब भी जुबान पर आता है, तो भदोही के विजय मिश्रा का जिक्र जरूर होता है। एक दौर था जब ज्ञानपुर की धरती पर विजय मिश्रा की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। लेकिन आज वक्त ऐसा बदला है कि वही विजय मिश्रा अदालत के कठघरे में खड़े हैं और उनका दशकों पुराना साम्राज्य बिखरता नजर आ रहा है।
वह दौर जब चलता था विजय मिश्रा का सिक्का
विजय मिश्रा सिर्फ एक विधायक नहीं थे, बल्कि भदोही और आसपास के जिलों के लिए ‘पावर सेंटर’ थे। ज्ञानपुर विधानसभा सीट उनकी ऐसी जागीर बन गई थी कि वह जेल में रहकर भी चुनाव जीत जाते थे।
जनता से जुड़ाव: विजय मिश्रा की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी अंदाज था। वह गांव-गांव जाकर लोगों की मदद करते थे, जिसकी वजह से आम जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बनी रही।
मुलायम के करीबी: वह पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के इतने खास थे कि 2007 में जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही थी, तब मुलायम सिंह उन्हें अपने हेलीकॉप्टर में बैठाकर ले गए थे।
अपनों से ही ली दुश्मनी, जो बनी पतन की वजह
विजय मिश्रा के राजनीतिक करियर का सबसे कमजोर पहलू उनकी अपनों से ‘अदावत’ (दुश्मनी) रही। उन पर आरोप लगे कि उन्होंने अपने ही समाज के ब्राह्मण नेताओं को दबाने की कोशिश की।
बड़े दुश्मन: पूर्व सांसद पंडित गोरखनाथ पांडेय के भाई की हत्या का मामला हो या पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा से सियासी जंग, विजय मिश्रा ने अपने खिलाफ विरोधियों की एक लंबी फौज खड़ी कर ली।
उदयभान सिंह से टकराव: गोपीगंज के तिहरे हत्याकांड ने उनकी छवि और राजनीतिक भविष्य पर गहरे दाग लगाए।
योगी सरकार और ‘जीरो टॉलरेंस’ का प्रहार
2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इसके बाद विजय मिश्रा के बुरे दिन शुरू हो गए।
संपत्ति पर कार्रवाई: सरकार ने उनके अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलवाया और करोड़ों की संपत्ति कुर्क कर ली।
पुराने मुकदमों का हिसाब: योगी सरकार ने विजय मिश्रा के खिलाफ दर्ज पुराने केसों की फाइलें फिर से खुलवाईं। जो मुकदमे सालों से ठंडे बस्ते में थे, उनमें तेजी से पैरवी शुरू हुई।
अदालत का फैसला और भविष्य का संकट
हाल ही में प्रयागराज की एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को 46 साल पुराने एक हत्याकांड में दोषी करार दिया है। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि अब उनका बाहर आना और दोबारा राजनीति में वही रसूख पाना लगभग नामुमकिन है।
आज की हकीकत: वक्त बदलते देर नहीं लगती
जिस ज्ञानपुर सीट पर कभी विजय मिश्रा का कब्जा था, वहां आज भाजपा-निषाद पार्टी गठबंधन के विधायक विपुल दुबे का राज है। विजय मिश्रा के करीबी जो कभी उनके साये की तरह चलते थे, आज अपना रास्ता बदल चुके हैं।
परिणाम: विजय मिश्रा का किस्सा हमें यह सिखाता है कि राजनीति में ‘अजेय’ कोई नहीं होता। कानून का हाथ और वक्त का पहिया जब घूमता है, तो बड़े-बड़े किलों की दीवारें ढह जाती हैं। भदोही की सियासत के इस कद्दावर नेता की कहानी अब अदालतों के चक्करों और जेल की सलाखों के बीच सिमट कर रह गई है।
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