भदोही में ‘स्कूल चलो’ की रफ्तार और पहचान की उलझन
आधार की तारीख, कठिन होती दाखिले की राह
विशेष संवाददाता , ब्यूरो चिंतन राजेश जायसवाल भदोही

भदोही उत्तर प्रदेश में इन दिनों ‘स्कूल चलो अभियान’ की गूंज से भरा है। प्रभात फेरियां निकल रही हैं, दीवारों पर नारे लिखे जा रहे हैं, और शिक्षक घर-घर दस्तक देकर नौनिहालों को कक्षा तक लाने का संकल्प दोहरा रहे हैं। पर इस उत्साह के बीच एक छोटी-सी ‘तारीख’ बड़ी दीवार बन गई है—आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि।
कई अभिभावकों की शिकायत है कि छह वर्ष के बच्चों के आधार में जन्मतिथि ऐसी दर्ज है, जिससे वे कागज़ों में बारह साल के दिखाई देते हैं। नतीजा—प्रवेश प्रक्रिया में भ्रम, आयु-मानक पर सवाल, और मासूमों का स्कूल से वंचित रह जाना। कागज़ और कक्षा के बीच फंसा बचपन पूछ रहा है—गलती किसकी, सज़ा किसे?
भदोही में ‘स्कूल चलो अभियान’ पूरे जोर पर है। शिक्षक घर-घर संपर्क कर रहे हैं, रैलियां निकल रही हैं, नामांकन बढ़ाने के लक्ष्य तय हैं। लेकिन इस अभियान की चमक के पीछे कई ऐसे सवाल हैं, जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद को कुरेदते हैं।
आधार की त्रुटि, बच्चे की बाधा
कई अभिभावकों का कहना है कि छोटे बच्चों के आधार कार्ड में जन्मतिथि गलत दर्ज है—छह साल का बच्चा कागज़ों में बारह साल का दिख रहा है। प्रवेश के समय आयु-मानक का विवाद खड़ा हो जाता है और मासूम बच्चे दाखिले से वंचित रह जाते हैं। कागजी गलती का खामियाजा शिक्षा से दूर होता बचपन भुगत रहा है।
हर गली में निजी स्कूल, सरकारी स्कूल पर असर
नगर क्षेत्र में सरकारी स्कूलों के आसपास कुछ ही दूरी पर कई निजी विद्यालय संचालित हैं। 150–200 मीटर पर एक नया बोर्ड दिख जाता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या दूरी और मानकों की गाइडलाइन का पालन हो रहा है?
यदि एक ही क्षेत्र में कई निजी विद्यालयों को मान्यता मिलती रहेगी, तो सरकारी स्कूलों के नामांकन पर प्रभाव पड़ेगा ही। फिर भी लक्ष्य पूरा करने का दबाव मुख्य रूप से सरकारी शिक्षकों पर ही क्यों?
मूलभूत सुविधाओं की कमी: सबसे बड़ा संकट
नगर के अंदर स्थित होने के बावजूद कई सरकारी स्कूल उपेक्षा का शिकार हैं। कहीं शौचालय अधूरे हैं, कहीं पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं, कहीं कक्षाओं की मरम्मत लंबित है। डिजिटल शिक्षा की बात तो दूर, कई स्थानों पर पंखे और बिजली की स्थिति भी संतोषजनक नहीं।
ऐसे में शिक्षक एक ओर एडमिशन के लिए अभिभावकों को समझाते हैं, दूसरी ओर संसाधनों की कमी से जूझते हैं। वे बच्चों को लाने का संकल्प तो निभा रहे हैं, लेकिन व्यवस्था का साथ अधूरा लगता है।
शिक्षक का संघर्ष, व्यवस्था की जिम्मेदारी
सरकारी शिक्षक आज दोहरी चुनौती झेल रहे हैं—
नामांकन बढ़ाने का प्रशासनिक दबाव
सीमित संसाधनों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की जिम्मेदारी
यदि बुनियादी सुविधाएं सुदृढ़ नहीं होंगी और नीति-निर्णय संतुलित नहीं होंगे, तो ‘स्कूल चलो’ का नारा केवल अभियान बनकर रह जाएगा, स्थायी परिवर्तन नहीं।
समाधान की राह
आधार त्रुटियों के त्वरित सुधार के लिए विशेष शिविर
स्कूल मान्यता प्रक्रिया में पारदर्शिता और दूरी मानकों का सख्त पालन
सरकारी स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं का प्राथमिकता से उन्नयन
शिक्षकों पर केवल लक्ष्य नहीं, संसाधनों का भी समान वितरण
भदोही के सरकारी स्कूल किसी इमारत का नाम नहीं—वे उन बच्चों के सपनों की पहली सीढ़ी हैं, जिनके लिए शिक्षा ही भविष्य का एकमात्र सहारा है।
जरूरत है कि अभियान के नारों से आगे बढ़कर जमीनी सच्चाइयों को स्वीकार किया जाए और सरकारी विद्यालयों को वास्तव में सशक्त बनाया जाए—तभी ‘स्कूल चलो’ का आह्वान सार्थक होगा।