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बढ़ता स्कूल बैग बना राष्ट्रीय चिंता का विषय

 

“बोझ रहित शिक्षा” के दावे पर सवाल, अभिभावकों में नाराज़गी

विशेष संवाददाता/ ब्यूरो चिंतन राजेश जायसवाल भदोही

देश में स्कूली शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर बहस फिर तेज हो गई है। नन्हे बच्चों के कंधों पर लदे भारी स्कूल बैग अब केवल किताबों का वजन नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली की खामियों का प्रतीक बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों और अभिभावकों का कहना है कि “बोझ रहित शिक्षा” का सपना कागज़ों तक सीमित रह गया है।

दिशा-निर्देश मौजूद, पालन नदारद

वर्ष 2006 में Central Board of Secondary Education (CBSE) ने नर्सरी से कक्षा 2 तक के बच्चों को भारी बस्ता न देने के स्पष्ट निर्देश जारी किए थे। ये दिशा-निर्देश National Curriculum Framework 2005 (NCF 2005) के अनुरूप थे, जिसका उद्देश्य बच्चों को दबावमुक्त शिक्षा देना था।

इससे पहले 1993 में Learning Without Burden नामक ऐतिहासिक रिपोर्ट में शिक्षा को रटने और बोझ ढोने की प्रक्रिया बनने से रोकने की सिफारिश की गई थी।

हालांकि जमीनी स्तर पर इन निर्देशों का प्रभाव सीमित दिखाई देता है।

निजी स्कूलों पर उठे सवाल

अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी विद्यालय हर वर्ष नए प्रकाशकों की किताबें लागू कर देते हैं, जिससे खर्च बढ़ता जाता है। कुछ मामलों में विशेष दुकानों से किताबें खरीदने का दबाव भी डाला जाता है। इससे शिक्षा पर आर्थिक बोझ बढ़ने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि किताबों के बार-बार बदलाव से न केवल आर्थिक दबाव बढ़ता है, बल्कि शैक्षणिक निरंतरता भी प्रभावित होती है।

स्वास्थ्य पर असर

बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, स्कूल बैग का वजन बच्चे के शरीर के वजन का 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन कई मामलों में यह सीमा पार हो रही है।

डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक वजन के कारण—

रीढ़ की हड्डी में विकार

गर्दन और कंधों में दर्द

मानसिक तनाव

जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

अभिभावकों की चिंता

शिक्षा शुल्क, वार्षिक शुल्क, गतिविधि शुल्क और अतिरिक्त कोचिंग खर्च के चलते मध्यम वर्गीय परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का विकास होना चाहिए, न कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा।

सुधार की मांग

शिक्षा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि—

NCERT आधारित समान पाठ्यक्रम को बढ़ावा दिया जाए

स्कूल बैग के वजन संबंधी नियमों का सख्ती से पालन हो

निजी विद्यालयों की फीस संरचना में पारदर्शिता लाई जाए

किताबें खरीदने में स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए

निष्कर्ष

“बोझ रहित शिक्षा” की अवधारणा आज भी प्रासंगिक है, लेकिन इसे लागू करने के लिए ठोस निगरानी और नीति-स्तर पर सख्ती की आवश्यकता है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।

देश के भविष्य की नींव मजबूत करने के लिए जरूरी है कि बच्चों के कंधों से अतिरिक्त बोझ हटाया जाए—ताकि वे ज्ञान का भार नहीं, बल्कि सपनों की उड़ान लेकर आगे बढ़ सकें।

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