भदोही: आंखों में अंधेरा, दिल में चीखें… अंधे पति के सामने ही उजड़ गई दुनिया, कुदरत ने छीना गरीब का सहारा
भदोही (इंद्र यादव) उत्तर प्रदेश,कहते हैं कि गरीबी और लाचारी जब एक साथ आती है, तो इंसान का इम्तिहान लेने में कोई कसर नहीं छोड़ती। उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के दुर्गागंज थाना क्षेत्र से एक ऐसी ही रूह कपा देने वाली घटना सामने आई है। जहाँ एक नेत्रहीन पति की आंखों के सामने उसकी हमसफर, उसकी लाठी, उसकी दुनिया हमेशा के लिए खत्म हो गई।

बैंक के चक्कर और किस्मत का क्रूर मजाक
कुढ़वा गांव के रहने वाले रमाशंकर उर्फ लोदी गौंड और उनकी पत्नी मंजू देवी, दोनों ही आंखों से दिव्यांग थे। गरीबी का आलम यह था कि लोदी ढोल बजाकर अपने तीन मासूम बच्चों का पेट पालते थे। सरकार की तरफ से आवास तो मंजूर हुआ, लेकिन उसकी दूसरी किस्त निकालने के लिए यह नेत्रहीन जोड़ा पिछले दो दिनों से बैंक की दहलीज नाप रहा था।
तीसरे दिन भी जब पैसा नहीं मिला, तो दोनों मायूस होकर पैदल ही घर की ओर चल पड़े। उन्हें क्या पता था कि घर पहुँचने से पहले ही मौत उनका रास्ता रोककर खड़ी है।
500 मीटर की दूरी और काल बनकर गिरा नीम का पेड़
घर से महज 500 मीटर पहले अचानक मौसम ने करवट ली। तेज आंधी और बारिश से बचने के लिए दोनों एक नीम के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। तभी अचानक एक जोरदार आवाज हुई और वह विशालकाय पेड़ मंजू देवी के ऊपर गिर पड़ा। रमाशंकर चीखते रहे, मदद पुकारते रहे, लेकिन देख न पाने की बेबसी और कुदरत के कहर ने उनकी पत्नी को उनसे छीन लिया।
आसपास के ग्रामीण तुरंत मदद के लिए दौड़े, मंजू को मलबे से निकालकर भानीपुर स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
मासूमों के सिर से उठा साया, अब कौन बनेगा सहारा
मंजू देवी अपने पीछे 12 साल की बड़ी बेटी, एक और बेटी और एक छोटा बेटा छोड़ गई हैं। रमाशंकर, जो खुद देख नहीं सकते, अब इन तीन अनाथ बच्चों की जिम्मेदारी और पहाड़ जैसी जिंदगी के सामने अकेले खड़े हैं।
प्रशासनिक कार्रवाई और समाज से अपील
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और राजस्व विभाग की टीम मौके पर पहुँची। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। नायब तहसीलदार और लेखपाल ने नुकसान का आकलन किया है, लेकिन क्या सरकारी कागजों की भरपाई उस माँ और पत्नी की कमी पूरी कर पाएगी!
आज पूरा कुढ़वा गांव गमगीन है। ग्रामीणों ने प्रशासन और सक्षम समाज से पुरजोर अपील की है कि इस अत्यंत गरीब और दिव्यांग परिवार को विशेष आर्थिक सहायता दी जाए, ताकि इन तीन मासूमों का भविष्य अंधकार में न डूबे।
यह घटना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम और समाज के लिए एक सवाल है। क्या एक दिव्यांग जोड़े को अपने ही हक के पैसे के लिए इतने चक्कर लगाने चाहिए थे!
आज रमाशंकर की आंखों में रोशनी नहीं है, पर उनके आंसू बहुत कुछ कह रहे हैं।










