मुंबई। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच टकराव ने वैश्विक राजनीति को नई दिशा दे दी है। माना जा रहा है कि ईरान के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति अब अमेरिका के लिए उलझन बनती जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका को उम्मीद थी कि उसके पारंपरिक सहयोगी, खासकर जर्मनी समेत अन्य यूरोपीय देश इस रणनीति में उसका साथ देंगे। हालांकि जर्मनी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह किसी ऐसे संघर्ष का हिस्सा नहीं बनेगा जो उसके हितों के अनुकूल न हो।
इस बीच रूस और चीन का रुख भी अहम माना जा रहा है। अमेरिका के दबाव के बीच ईरान इन दोनों देशों के और करीब आता दिख रहा है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन में नए समीकरण उभर रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना केंद्र
होर्मुज स्ट्रेट को इस पूरे संकट का सबसे अहम बिंदु माना जा रहा है। दुनिया के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यदि यहां आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक तेल बाजार और शेयर बाजार पर व्यापक असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आपूर्ति में रुकावट से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है और शिपिंग लागत में भी इजाफा हो सकता है।
कूटनीति बनाम सैन्य रणनीति
यह संकट इस बात की ओर इशारा करता है कि आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में केवल सैन्य ताकत के सहारे समाधान संभव नहीं है। यूरोपीय देशों का सतर्क रुख यह दर्शाता है कि अब वे संघर्ष की बजाय आर्थिक स्थिरता और कूटनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भारत पर संभावित असर
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर है। तेल कीमतों में वृद्धि से महंगाई बढ़ सकती है, रुपये पर दबाव आ सकता है और शेयर बाजार में अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
वर्तमान हालात में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस तनाव को कम कर पाते हैं या यह संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति के लिए और गंभीर चुनौती बनता है।
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